जयपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भारत को उसकी अपनी संस्कृति, जीवन मूल्यों और व्यक्तित्व के आधार पर आगे बढ़ाने की जीवन दृष्टि दी। उनका एकात्म मानवदर्शन केवल भारत या किसी राजनीतिक संगठन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी मानवता के लिए मार्गदर्शन और एक वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत करता है। होसबाले शुक्रवार को पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 110वीं जयंती के अवसर पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति समारोह समिति की ओर से जयपुर के धानक्या में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने धानक्या की पवित्र भूमि और दीनदयाल उपाध्याय स्मारक का उल्लेख करते हुए कहा कि यह स्थान आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्र और समाज के लिए कार्य करने की प्रेरणा देता रहेगा।

उन्होंने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय ने भारतीय संस्कृति और जीवन दर्शन के सार को आधुनिक युग के संदर्भ में एकात्म मानवदर्शन के रूप में प्रस्तुत किया। जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने उपनिषदों के सार को गीता के माध्यम से मानवता के सामने रखा, उसी प्रकार दीनदयाल उपाध्याय ने भारतीय चिंतन के मूल तत्वों को एकात्म मानवदर्शन के रूप में सामने रखा। होसबाले ने कहा कि दुनिया को केवल पूंजीवाद और साम्यवाद के दो विकल्पों में नहीं बांटा जा सकता। एक व्यवस्था में स्वतंत्रता पर अत्यधिक जोर देने से असमानता और शोषण बढ़ा, जबकि दूसरी ओर समानता के अत्यधिक आग्रह में स्वतंत्रता प्रभावित हुई। भारतीय चिंतन व्यक्ति, समाज, सृष्टि और परमेश्वर के बीच संबंधों को ध्यान में रखकर समाज व्यवस्था को देखने की दृष्टि देता है।

उन्होंने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय का स्पष्ट विचार था कि भारत को अमेरिका, इंग्लैंड या जापान नहीं बनना है, बल्कि भारत को भारत बनाना है। भारतीय संस्कृति, व्यक्तित्व और जीवन मूल्यों के आधार पर विकसित जीवन दर्शन न केवल देश बल्कि पूरी दुनिया के लिए मार्गदर्शक बन सकता है। उन्होंने एकात्म मानवदर्शन को केवल पुस्तकों और शोध तक सीमित रखने के बजाय सामाजिक जीवन में उतारने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि विद्वानों को इस विषय पर अध्ययन और शोध करना चाहिए, लेकिन इसके साथ समाज में इन विचारों के व्यावहारिक प्रयोग भी होने चाहिए, ताकि दुनिया इनके परिणामों को देखकर इनकी उपयोगिता को समझ सके।

गांवों में पढ़ाई, कमाई और दवाई जरूरी
ग्रामीण विकास पर जोर देते हुए होसबाले ने कहा कि यदि गांवों में पढ़ाई, कमाई और दवाई की पर्याप्त व्यवस्था हो तो शहरों की ओर पलायन को रोका जा सकता है। उन्होंने कृषि, कुटीर उद्योग, हस्तशिल्प और स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने नानाजी देशमुख द्वारा चित्रकूट और गोंडा क्षेत्र में किए गए ग्राम विकास के कार्यों का उदाहरण देते हुए एकात्म मानवदर्शन के सामाजिक प्रयोगों को आगे बढ़ाने की बात कही। उन्होंने कहा कि सरकार की योजनाएं और नीतियां जरूरी हैं, लेकिन केवल सरकारी तंत्र के माध्यम से ग्रामीण विकास संभव नहीं है। समाज को जागरूक होकर सामूहिक प्रयास करने होंगे और ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के अनुभव एवं स्थानीय ज्ञान को विकास का आधार बनाना होगा।

मानव कल्याण के लिए हो तकनीक का इस्तेमाल
तकनीक को लेकर होसबाले ने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय तकनीक के विरोधी नहीं थे। उनका जोर ऐसी तकनीक पर था जो मानव जीवन को सुखी बनाए, पर्यावरण के अनुकूल हो, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों पर बोझ न डाले और रोजगार के अवसरों को खत्म न करे। तकनीक मानव को नियंत्रित करने वाली नहीं, बल्कि उसके कल्याण में सहायक होनी चाहिए। उन्होंने स्वदेशी को भी युगानुकूल बनाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि विदेशों से आने वाले ज्ञान और तकनीक को स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए, लेकिन उसे भारतीय परिस्थितियों और जरूरतों के अनुरूप ढालना जरूरी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहित आधुनिक तकनीक के दौर में यह विचार करना आवश्यक है कि तकनीक का इस्तेमाल मानव हित में किस तरह किया जाए।

होसबाले ने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय स्वयंसेवक, प्रचारक, राजनेता, विद्वान, अर्थशास्त्री, साहित्यकार और लेखक के रूप में बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने सामाजिक समरसता, पर्यावरण, परिवार, स्वदेशी और नागरिक कर्तव्य जैसे विषयों को अपने जीवन में भी उतारा।
उन्होंने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय का स्मरण केवल जयंती पर श्रद्धांजलि देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उनके विचारों पर चिंतन करने के साथ उनके जीवन से प्रेरणा लेकर उसे व्यवहार में उतारने का प्रयास होना चाहिए। दीनदयाल उपाध्याय ने भारत के परम वैभव के लिए अपना जीवन समर्पित किया और हमें भी उनके विचारों से प्रेरणा लेकर राष्ट्र निर्माण में योगदान देने का संकल्प लेना चाहिए। कार्यक्रम की अध्यक्षता उद्यमी मनीष गुप्ता ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में जेईसीआरसी विश्वविद्यालय के अध्यक्ष ओपी अग्रवाल मौजूद रहे। समारोह समिति के अध्यक्ष प्रोफेसर मोहनलाल छीपा ने समिति की गतिविधियों और उद्देश्यों की जानकारी दी, जबकि सचिव प्रताप भानु शेखावत ने आगामी योजनाओं के बारे में बताया।

समारोह में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों और कृतित्व पर शोध के लिए विभिन्न शोधार्थियों एवं विद्वानों को सम्मानित किया गया। इनमें रांची विश्वविद्यालय के शोधार्थी डॉ. सोहन सिंह, हिमाचल केंद्रीय विश्वविद्यालय के डॉ. जगदीश सिंह चंदेल, मथुरा के डॉ. अंशुमान कौशिक और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के डॉ. नागेश चौबे शामिल रहे। लोक कला एवं संगीत के क्षेत्र में योगदान के लिए आलोकवादक पद्मश्री तगाराम भील और भपंग वादक पद्मश्री गफरुद्दीन मेवाती को भी सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में आभार समिति के उपाध्यक्ष नीरज कुमावत ने व्यक्त किया और संचालन गजेंद्र ज्ञानपुरिया ने किया।





