जयपुर, 25 सितंबर। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को अनंत चतुर्दशी या अनंत चौदस के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह पर्व शुक्रवार, 25 सितंबर को मनाया जा रहा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा की जाती है और 14 गांठों वाला अनंत सूत्र धारण किया जाता है। इसी दिन दस दिवसीय गणेश उत्सव का समापन भी होता है और श्रद्धालु गणपति प्रतिमाओं का विसर्जन करते हैं। पंचांग के अनुसार चतुर्दशी तिथि 24 सितंबर की रात 11:18 बजे से शुरू होकर 25 सितंबर की रात 11:06 बजे तक रहेगी। अनंत चतुर्दशी की पूजा के लिए सुबह 6:11 बजे से रात 11:06 बजे तक का समय बताया गया है। अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11:48 बजे से 12:38 बजे तक रहेगा।
भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की होती है पूजा
हिंदू धर्म में ‘अनंत’ का अर्थ उस सत्ता से है जिसका कोई अंत नहीं है। धार्मिक मान्यता के अनुसार अनंत चतुर्दशी पर भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की आराधना की जाती है। इस दिन 14 गांठों वाला अनंत सूत्र धारण करने की परंपरा है। इन 14 गांठों को ब्रह्मांड के 14 लोकों का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व पांडवों के 14 वर्ष के वनवास से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से अनंत भगवान की पूजा करने तथा अनंत सूत्र धारण करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और संकटों से रक्षा होती है।
सुशीला और कौण्डिन्य ऋषि की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार सुमंत नामक ब्राह्मण की पुत्री सुशीला का विवाह कौण्डिन्य ऋषि से हुआ था। दोनों आर्थिक रूप से परेशान थे। एक दिन सुशीला ने कुछ महिलाओं को अनंत भगवान की पूजा करते और 14 गांठों वाला सूत्र धारण करते देखा। पूजा की महिमा जानने के बाद सुशीला ने भी श्रद्धा से अनंत व्रत किया और बाएं हाथ में अनंत सूत्र बांधा। मान्यता है कि इसके बाद उनके घर में सुख-समृद्धि आने लगी। हालांकि कौण्डिन्य ऋषि ने अनंत सूत्र को देखकर उसे अंधविश्वास समझा और क्रोध में आकर सूत्र तोड़कर अग्नि में डाल दिया। इसके बाद उनके जीवन में फिर से परेशानियां आने लगीं।
अपनी भूल का एहसास होने पर कौण्डिन्य ऋषि अनंत भगवान की खोज में वन-वन भटकने लगे। कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने वृद्ध ब्राह्मण के रूप में उन्हें दर्शन दिए और अनंत व्रत की महिमा बताई। ऋषि ने 14 वर्षों तक व्रत किया और उन्हें खोई हुई समृद्धि वापस प्राप्त हुई।
एक अन्य मान्यता पांडवों से जुड़ी है। कहा जाता है कि वनवास के दौरान युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से संकट से निकलने का उपाय पूछा था। श्रीकृष्ण ने उन्हें अनंत चतुर्दशी का व्रत करने की सलाह दी। पांडवों ने श्रद्धा से व्रत किया और बाद में अपना राजपाट वापस प्राप्त किया।
महिलाओं के लिए क्या है विशेष?
अनंत चतुर्दशी का व्रत विशेष रूप से सुहागिन महिलाओं द्वारा पति की लंबी आयु, परिवार की सुख-समृद्धि और संकटों से रक्षा की कामना के लिए किया जाता है। कई महिलाएं इस दिन निर्जला या फलाहारी व्रत रखती हैं। हालांकि व्रत की विधि और आहार संबंधी परंपराएं परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं।
सुबह स्नान के बाद पीले वस्त्र धारण कर पूजा स्थल को शुद्ध किया जाता है। भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर पंचामृत, पीले फूल, तुलसी दल और फल अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद 14 गांठों वाला अनंत सूत्र तैयार कर भगवान के चरणों में रखा जाता है।
पूजा के बाद महिलाएं बाएं हाथ और पुरुष दाएं हाथ में अनंत सूत्र धारण करते हैं। कुंवारी कन्याएं भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से अनंत सूत्र धारण करती हैं। पूजा के दौरान अनंत भगवान की कथा सुनने और मंत्र जाप की परंपरा है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार अनंत चतुर्दशी का व्रत एक बार संकल्प लेकर लगातार 14 वर्षों तक करने की परंपरा भी बताई गई है। इस दौरान श्रद्धालु भगवान विष्णु से परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और सभी प्रकार के संकटों से रक्षा की कामना करते हैं।
अनंत चतुर्दशी का एक और प्रमुख आकर्षण गणेश विसर्जन है। दस दिनों तक चले गणेश उत्सव के बाद श्रद्धालु भगवान गणेश की प्रतिमाओं को श्रद्धा और भक्ति के साथ जल में विसर्जित करते हैं। इस दौरान जयकारों और धार्मिक आयोजनों के साथ गणपति बप्पा को अगले वर्ष फिर आने का निमंत्रण दिया जाता है।





